जिला बाल कल्याण समिति कांगड़ा की ओर से अभिभावकों एवं समाज के लिए परामर्श
डेली पब्लिक लाइव न्यूज़ (कांगड़ा ) 30 अगस्त। आज मोबाइल फोन बच्चों और किशोरों की शिक्षा, जानकारी और संचार का महत्वपूर्ण माध्यम बन चुका है। लेकिन जब मोबाइल का उपयोग आवश्यकता से बढ़कर लगातार स्क्रीन देखने, गेमिंग, सोशल मीडिया, देर रात तक जागने और वास्तविक जीवन की गतिविधियों से दूरी का कारण बनने लगे, तो यह चिंता का विषय है। किशोरावस्था बच्चों के शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक विकास की अत्यंत महत्वपूर्ण अवस्था है। इसलिए मोबाइल के अत्यधिक एवं अनियंत्रित उपयोग को केवल “बच्चे की जिद” न मानकर परिवार और समाज को मिलकर इसका समाधान करना चाहिए।
अभिभावक पहले अपनी आदत बदलें
बच्चों को मोबाइल से दूर रखने की शुरुआत घर के बड़ों से होनी चाहिए। यदि माता-पिता स्वयं हर समय मोबाइल में व्यस्त रहेंगे, तो बच्चे से मोबाइल कम करने की अपेक्षा करना कठिन होगा।
अभिभावक—
बच्चों के सामने अनावश्यक रूप से मोबाइल का इस्तेमाल कम करें।
भोजन, पारिवारिक बातचीत और सोने के समय मोबाइल से दूरी रखें।
छोटे बच्चों को शांत कराने या व्यस्त रखने के लिए लगातार मोबाइल न दें।
बच्चे के लिए उम्र के अनुरूप स्पष्ट स्क्रीन-टाइम नियम बनाएं और उसका पालन स्वयं भी करें।
बच्चे मोबाइल पर क्या देख रहे हैं, किन लोगों से संपर्क कर रहे हैं और कौन-से गेम/ऐप इस्तेमाल कर रहे हैं, इसकी जानकारी रखें।
केवल डांटने या मोबाइल छीन लेने के बजाय बच्चे से प्यार और धैर्यपूर्वक संवाद करें।
मोबाइल के विकल्प बच्चों को दें
बच्चे को केवल यह कहना पर्याप्त नहीं है कि “मोबाइल मत चलाओ।” उसके स्थान पर बेहतर विकल्प उपलब्ध कराना भी जरूरी है।
बच्चों को खेलकूद, योग, पुस्तक-पठन, संगीत, चित्रकला, बागवानी, रचनात्मक गतिविधियों, मित्रों एवं परिवार के साथ समय बिताने के लिए प्रोत्साहित किया जाए। प्रतिदिन कुछ समय परिवार के सभी सदस्य साथ बैठकर बातचीत करें।
विशेषकर किशोर बच्चों की बात सुनी जाए, केवल सुनाई न जाए। उनकी परेशानियों, मित्रता, पढ़ाई, भावनाओं और सोशल मीडिया से जुड़े अनुभवों पर बिना डराए बातचीत करना आवश्यक है।
मोबाइल की लत के संकेतों को नजरअंदाज न करें
यदि बच्चा मोबाइल न मिलने पर अत्यधिक चिड़चिड़ा या आक्रामक हो जाए, पढ़ाई और नींद प्रभावित होने लगे, परिवार एवं मित्रों से दूरी बनाने लगे, खेलकूद में रुचि समाप्त हो जाए या अधिकांश समय मोबाइल के बारे में ही सोचता रहे, तो अभिभावकों को सावधान हो जाना चाहिए।
ऐसी स्थिति में बच्चे को अपमानित, प्रताड़ित या सबके सामने शर्मिंदा करने के बजाय बाल मनोवैज्ञानिक/काउंसलर अथवा अन्य योग्य विशेषज्ञ से परामर्श लेना उचित है। यदि बच्चा गंभीर भावनात्मक संकट में दिखाई दे या स्वयं को नुकसान पहुंचाने की बात करे, तो इसे बिल्कुल हल्के में न लें और तत्काल विशेषज्ञ/आपात सहायता प्राप्त करें।
स्कूल और समाज की भी महत्वपूर्ण भूमिका
मोबाइल की समस्या केवल एक परिवार की समस्या नहीं है। विद्यालयों को भी बच्चों को डिजिटल अनुशासन, साइबर सुरक्षा, सोशल मीडिया के सही उपयोग और डिजिटल एडिक्शन के दुष्प्रभावों के बारे में जागरूक करना चाहिए।
पंचायतें, स्थानीय संस्थाएं, युवा क्लब, स्वयंसेवी संगठन और सामाजिक कार्यकर्ता बच्चों के लिए खेल, सांस्कृतिक कार्यक्रम, पुस्तकालय, कला एवं अन्य रचनात्मक गतिविधियों के अवसर बढ़ा सकते हैं। इससे बच्चों को मोबाइल स्क्रीन की जगह समाज और वास्तविक जीवन से जुड़ने का अवसर मिलेगा।
बच्चों को दोष नहीं, दिशा दें
हर बच्चे की परिस्थितियां अलग होती हैं। इसलिए मोबाइल के अत्यधिक उपयोग से परेशान बच्चे को “बिगड़ा हुआ” या “जिद्दी” कहकर उसकी समस्या को और गंभीर नहीं बनाना चाहिए। उसे समझने, सुनने और सही दिशा देने की आवश्यकता है।
जिला बाल कल्याण समिति कांगड़ा का मानना है कि बच्चों की सुरक्षा और स्वस्थ विकास केवल सरकारी तंत्र की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि माता-पिता, शिक्षक, परिवार, समुदाय और प्रत्येक जिम्मेदार नागरिक की साझा जिम्मेदारी है।
हमारा लक्ष्य मोबाइल को बच्चों का दुश्मन बनाना नहीं, बल्कि उन्हें यह सिखाना है कि तकनीक हमारे जीवन को आसान बनाने का साधन है, जीवन का विकल्प नहीं।
आइए संकल्प लें “बच्चों के हाथ में मोबाइल से पहले किताब, खेल और परिवार का हाथ हो; स्क्रीन से पहले संवाद हो;
और तकनीक के साथ अनुशासन भी हो।”
विक्रमजीत शर्मा अध्यक्ष,जिला बाल कल्याण समिति, कांगड़ा
बच्चों की सुरक्षा • स्वस्थ बचपन • बेहतर भविष्य।


